मित्रों ये कहानी एक उस बुजुर्ग पर आधारित है जो जीवन भर संघर्षशील रहा, जीवन से। जन्म से मृत्यु तक। ये मेरी कविता  “एक पुरोधा का अंत “का गद्य रूपान्तरण है ।

तो लीजिये प्रस्तुत है मेरी कविता एक पुरोधा के अंत का गद्य रूपान्तरण ।


हीरालाल यही नाम था उनका। आज हम सभी लोग उनकी शवयात्रा पर जा रहें हैं । उनकों उनके अंतिम मंजिल तक पहुँचाने, उनके साथ अंतिम यात्रा पर आज अंतिम बार।
आज रह-रह कर हीरालाल जी का चेहरा मेरे आँखों के सामने उभर रहा है। सामान्य कद, साँवला रंग, दुबली-पतली सी काया थी उनकी। मेरे ही कार्यालय में चपरासी के पद पर कार्यरत थे हीरालाल जी।हीरालाल जी हँसमुख स्वभाव के व्यक्ति थे। कभी भी किसी काम के लिए ना नही कहते थें। जब कभी भी उनकी जरूरत होती हीरालाल जी हाजिर हो जाते। अगर कोई उन्हें पुकारता हीरालाल जी , तो हीरालाल जी हाथ मे सूरती फेंटते हुए व मुस्कुराते हुए तुरन्त हाजिर हो जाते, इसीलिए पूरा कार्यालय उनका बड़ा ही सम्मान करता था।

हीरालाल जी के परिवार में उनकी पत्नी व तीन बच्चें थे, दो बेटियां व एक बेटा। हीरालाल जी का परिवार भी बड़ा संस्कारी था। सभी बच्चों की परवरिश उन्होंने बहुत ही अच्छे से करी थी । हीरालाल जी ने धन संग्रह करने की जगह बच्चों को अच्छी शिक्षा-दीक्षा को महत्व  दिया, यही कारण है कि आज इनके सभी बच्चें अच्छे-अच्छे पदों पर कार्यरत हैं । हीरालाल जी ने नौकरी में रहते-रहते अपने बच्चों की समस्त जिम्मेदारी भी पूरी कर दी थी । सभी बच्चों की शादियाँ अच्छी जगह करके। आज सभी बच्चे अपनी-अपनी गृहस्थी में खुश हैं । परन्तु  इन सब में हीरालाल जी खुद खस्ताहाल हो चूकें थे लोग समझातें भी कि कुछ अपने भविष्य के बारे में भी सोचिये तो मुस्कुराते हुए बडे गर्व से कहते ये है ना ! मेरा बेटा , मेरा बैंक बेलेंस

खैर दिन गुजरते चले गये और एक दिन हीरालाल जी का भी रिटायर होने का समय आ गया था। हम सभी कार्यालय के कर्मचारियों ने (बाँस से लेकर चपरासी) तक ने उन्हें भावभीनी विदाई दी।
    

रिटायरमेंट के बाद मिले फंड से हीरालाल जी ने एक जमीन का टुकड़ा ले लिया था, मगर मकान बनाना अब उनके सामर्थ्य से बाहर की बात थी। फिलहाल तो हीरालाल जी परिवार सहित किराए के मकान में रह रहे थें ।

एक दिन उनके बेटे ने उनसे कहा कि बाबूजी मेरी सरकारी नौकरी है , मुझे सरकार से ॠण मिल जायेगा अगर ये जमीन की रजिस्ट्री मेरे नाम पर हो तो। हीरालाल जी ने खुशी-खुशी जमीन की रजिस्ट्री अपने बेटे के नाम पर कर दी. इस तरह से हीरालाल जी के बेटे ने हीरालाल जी की जमीन को अपने नाम करवा ली थी।

बेटे ने बैंक से ॠण लेकर, मकान बनाना शुरू कर दिया। हीरालाल जी बहुत उत्साहित थे मकान बनने पर। रात-दिन मकान बनाने में मजदूरों के साथ लगें रहते मकान की बुनियाद का एक-एक पत्थर उन्होंने अपने हाथों से रखा था। मैं हीरालाल जी के चेहरे की चमक को देखता भी था और उसे महसूस भी करता, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा किराए के मकान में जो बिताया था और किराए के मकान में रहने का कष्ट हीरालाल जी ने सहा भी था। यहां तो अपने रिश्तेदार भी अगर मकान मालिक के रोल आ जाए तो वो रिश्तेदारी भूल जातें है । इसका अनुभव तो मेरे एक मित्र को भली प्रकार से है। कैसे उनके रिश्तेदार उनको आए दिन अपमानित करते रहते, रिश्तेदार के मकान में  किराए में रहने के चक्कर में।
  

खैर हीरालाल जी जाड़ो की कड़कड़ाती ठंड में अपने पालतु कुत्ते के साथ घर की पहरेदारी करतें, असल में आसपास कोई मकान तो थें नही और मकान के चौखट या अन्य सामान चोरी होने का डर जो बने रहता था। इसलिए हीरालाल जी रात में अकेले ही अपने कुत्ते के साथ अधूरे बने घर की पहरेदारी को चले जाते नवम्बर से लेकर जनवरी माह तक उनका ये क्रम निरन्तर बने रहता। आज भी जब मैं हीरालाल जी के उस हिम्मत के बारे में सोचता हूँ तो मैं आश्चर्य मैं पड़ जाता हूँ , सुनसान जगह पर स्थित मकान की पहरेदारी करना , वो भी, जाड़ों की रात में, और पीचहत्तर साल की उम्र में । खैर मकान भी बन के तैयार हो गया । हीरालाल जी अब खुश थें कि चलो बुढ़ापे में ही सही अपना मकान तो हुआ ।
         

समय शनैः-शनैः आगे बड़ रहा था  हीरालाल जी का बेटा हीरालाल जी को रोज आश्वस्त करता कि जल्द ही मकान आपके नाम पर कर दूँगा हीरालाल जी भी  हर दिन की प्रतीक्षा इस उम्मीद के साथ  करतें रहतें कि चलो बुढ़ापे में ही सही मेरे नाम पर मकान होगा। हालांकि वो अपनी पत्नी से कहते कि मैं बाद में मकान इसी को ही दे जाऊँगा, पर हीरालाल जी का सपना तो सपना ही बनकर रह गया ।
   

हीरालाल जी भी अब ये सोचकर ही संतुष्टि कर लेते चलो मकान मेरे नाम हो या बेटे के क्या फर्क पड़ता है। पर हीरालाल जी की पत्नी को ,बेटे द्वारा , बार-बार हीरालाल जी को झूँठें सपना दिखना अच्छा नही लगता था, परन्तु वो भी चुप ही रहती। एक दिन हीरालाल जी को , बेटे द्वारा, झूठे आश्वासन देता देख वो बिफर गयीं और बेटे को बुरी तरह से डाँट दिया फिर तो बेटा-बहु ने मिलकर हीरालाल जी व उनकी पत्नी को वो खरी-खोटी सुनाई कि हीरालाल जी स्तब्ध रह गये। उन्होंने कभी सपनें में भी इस बारे में नही सोचा था। खैर हीरालाल जी अब गुमसुम से रहने लगे थें । वो शेष जीवन जैसे-तैसे इस मकान में गुजार ही रहें थे कि

एक दिन ,हीरालाल जी के बेटे ने हीरालाल जी से दो टूक बात कर उनसे पत्नी सहित मकान छोड़ने को , ये कहकर, कह दिया कि अब इस मकान में उनके साथ उनके सास व ससुर जी रहने के लिए आने वाले हैं। तथा मकान में इतनी जगह तो नही है  कि , इसमें आप लोग भी रह सकें, क्योंकि उसके सास-ससुर को, उसके साले ने बेघर कर दिया, इसलिए हम उन्हें यहाँ ला रहे हैं ।
      

हीरालाल जी मकान छोड़ कर वृद्धाश्रम में जाने की तैयारी कर ही रहे थें, तभी उनका भतीजा उनकों  अपने साथ अपने घर लिवा ले जाने के लिए उनके पास आया एवं उनको अपने साथ ही अपने घर लिवा लाया। तब से हीरालाल जी भतीजे व उसके बच्चों के साथ रहने लगें । भतीजा व भतीजे की बहू दोनों ही हीरालाल जी व उनकी पत्नी का अच्छे से ख्याल रखनें लगे थें।

परन्तु हीरालाल जी उस सदमे से फिर कभी उबर नही पायें । वह हर रोज भतीजे के साथ उस मकान तक जाते बाहर से मकान को देखकर लौट आतें और भतीजे को बताना नही भूलते कि कैसे इस मकान में एक-एक पत्थर को उन्होंने रखा था ।
   

शनैः-शनैः हीरालाल जी का स्वास्थ्य भी ढीला पड़ने लगा था ,शायद अब उनकी जीने की इच्छा  भी खत्म होने लगी थी शायद। एक दिन अचानक उनकी तबियत ज्यादा ही खराब हो गयी । उन्हें अस्पताल में भर्ती कर दिया गया। बेटे को जब हीरालाल जी के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी दी गयी , तो उसने पार्टी में व्यस्त होने का कहकर अभी आने में असमर्थता व्यक्त कर दी । कल सुबह ही आ पाएगा कहकर फोन काट दिया । खैर रात में ही हीरालाल जी का निधन हो गया।
   

शवयात्रा अब श्मशान-घाट पहुँच चुकी थी हीरालाल जी का बेटा पिता के शव पर फूट-फूटकर रो रहा था । लोग बेटे की तारीफ में कसीदे पड़ रहे थे । कुछ लोग तो उसे श्रवण कुमार भी कह रहे थे । खैर हीरालाल जी अब पंचतत्व में विलीन हो चूकें थे । भतीजा एक कोने में चुपचाप खड़ा था और उसके आँखों से छलकते आंसु अपने बड़े बाबा को मौन व सच्ची ॠद्धाजंलि दे रहे थें। जिसको दुनिया देख नही पा रही थी सिवाय मेरे । लेखक-हिमांशु पाठक

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